Saturday, August 30, 2014

पाना तो उसका ही है

फरवरी २००७ 
श्वास रुक जाएगी चलते चलते, शमा बुझ जाएगी जलते-जलते” भक्त जानता है, आज सेवा का अवसर मिला है कल जाने मिले या न मिले और मिले भी तो हम रहें या न रहें यह भी नहीं जानते. जब हम अपनी भावनाओं को कोमल और मृदु बना लेते हैं तो हम सहज रह सकते हैं. जिसके भीतर धैर्य रूपी रत्न और शौर्य रूपी आभूषण है वह इस जगत को और सुंदर बना सकता है. यह सारी सृष्टि उसी एक का रूप है, सभी प्राणी उसी के अंश हैं. हानि-लाभ की बात तब रहती ही नहीं, सर्वोच्च लाभ तो भक्त पहले ही पा चुका होता है  


पल भर भी न स्वयं को भूलें

फरवरी २००७ 
साक्षी होकर रहना ही ध्यान है, आत्मा द्रष्टा है, अज्ञान के कारण वह स्वयं को कभी देह, कभी मन, कभी बुद्धि तथा कभी अहंकार मानता है और व्यर्थ ही सुख-दुःख का भागी बनता है. यहाँ जो कुछ भी दिखाई देता है वह नष्ट होने वाला है. यहाँ दो ही कृत्य हो रहे हैं - जो भी उत्पन्न होता है वह नष्ट हो जाता है. अध्यात्म हमें वास्तविकता की ओर ले जाता है, वह हमें पाप-पुण्य दोनों से मुक्त करता है. तब हम कर्ता नहीं रहते. जब हम कर्ता नहीं हैं तो कोई दूसरा भी कर्ता कैसे हो सकता है. अतः किसी को दोषी देखना भूल ही है. व्यर्थ ही ऐसा करके हम अपने मन में विचारों का बवंडर खड़ा कर लेते हैं, जबकि साधक का लक्ष्य तो स्वयं को इन विचारों से मुक्त करना है. इस मार्ग पर चलना तलवार की धार पर चलने जैसा ही है, थोड़ी सी असावधानी से हम अपने स्वरूप से हट जाते हैं, थोड़ी देर के लिए अपने शुद्ध स्वरूप को भूल जाते हैं.


Thursday, August 28, 2014

कर्मों का जो राज जान ले

फरवरी २००७ 
कर्म से जन्म होता है, कर्म से मृत्यु होती है. कर्म ही हमें चलाता है. हमारा मन कल्पना से ही अपने दुःख के लिए दूसरों को दोषी मान लेता है, कभी हम भाग्य को दोष देते हैं पर कर्म का सिद्धांत कहता है कि हमें इस जन्म में जो भी परिस्थिति मिली है वह प्रारब्ध कर्मों का फल है. जो नए कर्म हम करते हैं वे भी संचित कर्मों में जमा हो जाते हैं. आत्मा अकर्ता है जब हम उसमें स्थित हो जाते हैं तो नये कर्म होते ही नहीं, पुराने भी ज्ञानाग्नि में जल जाते हैं. प्रारब्ध कर्मों का फल अवश्य मिलता है पर हम उसके भोक्ता नहीं होते. भीतर समरसता बनी रहती है बाहर चाहे जैसी परिस्थिति हो. कितना अद्भुत है ज्ञान का यह पथ. आत्मा में स्थित होने के बाद उस परम का भी ज्ञान होता है जिसका यह अंश है. सारा विषाद खो जाता है. तब असली भक्ति यानि परा भक्ति का उदय होता है. प्रेम प्रकट होता है, ऐसा प्रेम जो सारी सृष्टि की ओर बहने लगता है. सभी के भीतर तो एक ही सत्ता है, सारा जगत उसी का रचाया खेल है यह ज्ञात होने पर ही जगत निर्दोष दिखाई देने लगता है.

Wednesday, August 27, 2014

मृत्योहम शिवोहम

फरवरी २००७ 
रात्रि काल में हम जो स्वप्न देखते हैं, वे हमारी इच्छा से नहीं आते, एक तरह से वे हम पर थोपे जाते हैं. जब भीतर की चेतना जगती है, तब सपनों पर हमारा अधिकार हो जाता है. जो स्वयं को सोये हुए देख लेता है वह भय से छूट जाता है साधना के द्वारा योगी मृत्यु का भी ज्ञान प्राप्त कर लेते हैं. अपने अगले जन्म की तैयारी हम इसी जन्म में कर सकते हैं. भगवान शिव ने पार्वती को जीवन और मृत्यु का यह अद्भुत ज्ञान दिया था.


Monday, August 25, 2014

फूल खिले जब ध्यान का

फरवरी २००७ 
सद्गुरु कहते हैं, ध्यान उत्तम प्रार्थना है. हमारे भीतर ही ऐसा कुछ है जहाँ पूर्ण विश्राम है. मन तो सागर की लहरों की तरह है अथवा आकाश के बादलों की तरह, जो आते हैं और चले जाते हैं, और सारे विकार वे भी तो मात्र विचार हैं जिनका कोई अस्तित्त्व ही नहीं. भय का विचार हमें कैसे जड़ कर देता है, जबकि वह है क्या, एक कल्पना ही तो ! हम खाली हैं, ठोस तो केवल अस्तित्त्व है जो सदा रहने वाला है, वास्तव में वही हम हैं, जिसमें से रिसता है प्रेम, करुणा, कृतज्ञता और शांति. जिसमें से झरता है आनंद. पहले विचार आंदोलित करते रहे हों पर ध्यान के बाद वे बेजान हो जाते हैं. उन्हें देखना भर है. उनमें स्वयं की शक्ति नहीं है, वे आते हैं और चले जाते हैं, जिसने तय कर लिया है कि अब से उसके जीवन में जो भी होगा श्रेष्ठतम ही होगा, उससे कम नहीं, सारा अस्तित्त्व उसके साथ है. ईश्वर श्रेष्ठतम है और वह हर क्षण हमारे साथ है.


एक लहर उमड़े मस्ती की

जनवरी २००७ 
कोई हमारे कार्यों की प्रशंसा करे, निंदा करे या उपेक्षा, हर हाल में हमें निर्लेप रहना है. हम अपने भीतर स्थित रहें और यह मान लें कि निज ज्ञान की स्थिति के आधार पर ही लोग जगत में व्यवहार करते हैं. हमें उनके भीतर भी परमात्मा को ही देखना है और अपने भीतर की सौम्यता को बनाये रखना है. यह जगत उसी की रचना है और वह निर्दोष है, उसे तो इस जगत से कुछ लेना-देना नहीं है, उसने मात्र संकल्प से इसे रचा है, जैसे हम स्वप्न में सृष्टि बनाते हैं तो क्या हमारा दोष देखा जाता है यदि स्वप्न में हमें कोई हानि हो. ऐसे ही यह जगत भी एक लीला है, नाटक है, स्वप्न है इसमें इतना गम्भीर होने की कोई बात नहीं है. यहाँ सभी कुछ घट रहा है. यहाँ हम बार-बार सीखते हैं बार-बार भूलते हैं. नित नया सा लगता है यह जगत. हम वर्षों साथ रहकर भी कितने अजनबी बन जाते हैं एक क्षण में और जिनसे पहली बार मिले हों एक पल में अपनापन महसूस करने लगते हैं. कितनी अनोखी है यह दुनिया, कितनी विचित्र ! और हम यहाँ क्या कर रहे हैं ? हमें यहाँ भेजा गया है ताकि हम इस सुंदर जगत का आनन्द ले सकें और उस आनन्द को जो हमारे भीतर है बाहर लुटाएं.  

Friday, August 22, 2014

मन के रूप अनेक

जनवरी २००७ 
हमारा मन तरल है, इसे जहाँ लगायें वह वैसा ही आकार ग्रहण लेता है. यह वही सोचता है वही कहता है, वही करता है जो हमने इसे सिखाया है. जैसे संस्कार हमने इसे दिए हैं वैसा ही यह बन जाता है. मन से बड़ा मित्र कोई नहीं और इससे बड़ा शत्रु भी कोई नहीं. जब तक इसमें आनन्द की कोंपलें नहीं खिलीं तब तक मन कृतज्ञता के गीत नहीं गाता, और जब तक कृतज्ञता के गीत नहीं गाता तब तक कृपा की वर्षा नहीं होती, कृपा से ही आनंद स्थायी होता है. जो मन स्वयं से दूर हो जाता है वह दुखी हो जाता है.