Wednesday, January 16, 2013

प्रेम से प्रकट होए मैं जाना...


जनवरी २००४ 
हमारी जीवन शैली हिंसात्मक है या अहिंसात्मक इसका पता हमें दो-तीन बातों से लग जाता है, हम स्वतंत्रता का अनुभव करते हैं या परतंत्रता का, सापेक्षता का अथवा निरपेक्षता का, अशांति का अथवा शांति का. हमारा मन यदि क्षोभ से भर जाता है तो हम हिंसा के शिकार हैं, हम विरोध करते हैं, द्वंद्व का शिकार होते हैं तो भी हिंसा अपना कार्य कर रही है, हम असंवेदनशील हो रहे हैं, क्षमा नहीं कर  पाते तो हिंसा ही है. यही वह सूक्ष्म पर्दा है जो हम परमात्मा से अलग करता है. हम उसके प्रति प्रेम तो अनुभव करते हैं पर स्थिर नहीं रख पाते क्योंकि अब तक मन विरोध के भाव में आ चुका है. प्रेम में कोई विरोध नहीं होता, प्रेम सभी कुछ स्वीकारता है, अच्छा-बुरा सभी कुछ, विष-अमृत सभी कुछ !  

Tuesday, January 15, 2013

ध्यान परम पूजा है



हमारा व्यक्तित्व समग्र हो अर्थात हम सुसम्पन्न तथा शील सम्पन्न दोनों हों इसके लिए आवश्यक है की हम ज्ञान, क्रिया, प्रेम, कामना, इच्छा में समन्वय करें, संतुलन रखें. हम शरीर, मन और आत्मा हैं, तीनों का उत्तम स्वास्थ्य हमारा लक्ष्य है. हमारे मस्तिष्क में भाव केन्द्र पृथक है तथा विचार केन्द्र पृथक, दोनों का विकास आवश्यक है, ध्यान के द्वारा हम भावना को पुष्ट करते हैं. ध्यान में भीतर कुछ घटता है जो उस वक्त तो स्पष्ट नहीं होता परन्तु बाद में उसका प्रभाव अवश्य देखा जा सकता है. हमारी निरीक्षण क्षमता बढ़ जाती है, हम वस्तुओं को उनके सही रूप में देखने लगते हैं, मन शांत रहता है, विचार आते तो हैं पर शीघ्र ही हम उनकी उपयोगिता या व्यर्थता पहचान कर उन्हें स्वीकार या अस्वीकार करते हैं. हमारा मन तब सजग रहता है, ध्यान भीतर छुपी जन्मों की वासनाओं का शमन करता है. एक मुख्य विचार रह जाता है, जो वास्तव में हमारे ही भीतर है, जो हमारा आधार है, मल, विक्षेप तथा आवरण की वजह से हम उसे देख नहीं पाते, हमारे मन का पानी चंचल है तथा उस पर काई जमी है, ध्यान एक-एक कर इन्हें दूर करता है, और तब आत्मा का प्रतिबिम्ब उसमें दीख पड़ता है.   

Sunday, January 13, 2013

हर पथ उसकी ओर जा रहा


जनवरी २००४ 
क्रिया के कारण भीतर के आनंद का हमें पता चलता है. क्रिया और ज्ञान दोनों का समन्वय हो तभी हम अध्यात्म के पथ पर चल सकते हैं. धर्म व्यवहारिक हो तभी चेतना का विकास हो सकता है, चेतना का रूपान्तरण ध्यान के द्वारा किया जा सकता है. ध्यान हमारी सुप्त चेतना को जागृत करता है. सत्य हमारे भीतर है उसे खोजकर यदि हम जगत में व्यवहार करें तो ही हम सही रूप से उसका उपयोग कर सकते हैं. हम प्रतिक्षण अपने आप से प्रश्न करें कि क्या मेरा यह क्षण बंधन का कारण बनने वाला है या मुक्त करने वाला है. सर्वप्रथम शत्रु अहंकार है जिससे हमें सजग रहना है, बहुत सूक्ष्म होता है यह अहंकार और यह भी हिंसा का कारण बन जाता है, हम स्वयं में इतने न खो जाएँ की अन्य हमें बाधा स्वरूप लगें, हम इतने न बंध जाएँ कि छूटने में भी दर्द हो. हम अपनी कोहनी भर जगह तो अपने चारों और रखें ही ताकि सरलता से चल सकें और किसी को चोट भी न लगे. हमारा कोई व्यवहार किसी को चोट पहुंचाता हो तो उसकी भनक स्वयं को पहले लग जाती है. वह  परमेश्वर परब्रह्म सच्चिदानंद स्वरूप हमारे साथ जो है, वह सदा सचेत करता रहता है. उससे प्रीति होना इतना सरल व सहज भी नहीं है, तलवार की धार पर चलने जैसा है पर एक बार यदि चलना आ जाये तो भीतर की सच्चाईयाँ प्रकट होकर स्वयं राह बताती हैं तब वह सुह्रद स्वयं हमारा हाथ पकड़ कर सही पथ पर ले जाता है, तब गिरने का भी नहीं रहता. शरण में जाने के बाद उत्तरदायित्व उसका हो जाता है, कितनी भी बाधाएं आयें कोई भय नहीं क्योंकि उस निर्भय का साथ जो है.    

Saturday, January 12, 2013

उत्सव उसके संग मनाएं


मकर संक्रांति का त्यौहार पूरे देश में भिन्न-भिन्न नामों से मनाया जाता है, हर उत्सव पर हम ईश्वर से प्रार्थना  करते हैं, उसके करीब जाते हैं, मन के उल्लास को जगाते हैं, उत्सव हमें मन को इतर  कार्यों से खाली करने का प्रयास है, अथवा तो जो भी अच्छा-बुरा जीवन में हो उसे समर्पण करके पुनः नए हो जाने का संदेश देता है. उत्सव में एक साथ मिलकर जब आनंद मनाते हैं, तो ऊर्जा का संचार होता है, भीतर एक नया जोश भर जाता है. क्षण भर के लिए ही भौतिक देह का भाव मिटने लगता है, सारे भेद गिर जाते हैं और उस अव्यक्त की झलक मिल जाती है.  

Thursday, January 10, 2013

माँ के जैसा ही वह है


जनवरी २००४ 
जैसे माँ बच्चे के रूप में अपना विस्तार करती है, फिर उसे प्रेम देती है व प्राप्त करती है, वैसे ही परमात्मा ने हमें सिरजा है, भक्त और भगवान के बीच प्रेम का आदान-प्रदान ही भगवत्ता को सार्थक करता है. जैसे बच्चे माँ को भुला देते हैं, वैसे ही हम परम को भूल जाते हैं, पर तब भी वह हमें चाहते हैं वह सदा प्रतीक्षा रत हैं कि हम उनके निकट जाएँ जैसे माँ को बच्चों की सदा एक आस बनी रहती है. हमारे भीतर के सद्गुण रूपी देवता उसी परमात्मा की आराधना करते हैं और दुर्गुण रूपी असुर उससे उत्पीड़ित होते हैं. शुभ-अशुभ दोनों को वह ही रचता है और दोनों से परे वह अव्यक्त है. वह हमारे भीतर तीन रूपों में विद्यमान है, क्रिया, ज्ञान और भावना. वही कर्म के लिए प्रेरित करता है, वही हमें हमारे होने का ज्ञान देता है ज्ञान जब भीतर रच-बस जाता है वही भक्ति में बदल जाता है. मुक्त हुए बिना भक्ति सम्भव नहीं. यह त्रिवेणी जब जीवन में उतरती है तो जीवन का हर क्षण सुंदर बन जाता है.

Wednesday, January 9, 2013

शांति है जहां प्रगति है वहाँ


जनवरी २००४ 
शान्ति पूर्वक सहअस्तित्त्व हमारी पहली आवश्यकता है, तभी किसी भी तरह का विकास सम्भव है. अहिंसा का अर्थ केवल शारीरिक हिंसा से बचना ही नहीं है, बल्कि हमें इसके सूक्ष्म स्वरूप को भी जानना होगा. क्रोध का कोई भी रूप हिंसा है, द्वंद्व भी हिंसा है, द्वन्द्वातीत हुए बिना मन शांत नहीं हो सकता. अहिंसा का प्रारम्भ सर्वप्रथम घर से होता है, आज समाज के बदले हुए वातावरण में घरेलू हिंसा का शिकार वृद्ध, महिलाएं, बच्चे, अशक्त सभी किसी न किसी रूप में हो रहे हैं, आये दिन जो समाचार तथा आंकड़े मिलते हैं, उन्हें देखकर आश्चर्य होता है कि क्या हम एक सभ्य समाज के नागरिक हैं? धर्म जब तक जीवन का एक मह्त्वपूर्ण अंग नहीं बन जाता, आचरण में नहीं उतरता, परिवर्तन नहीं होगा. घरों में नियमित संध्या, ध्यान तथा सद्ग्रन्थों का पाठ होता रहे तो बच्चों को संस्कार मिलते रहते हैं. आज पीढियों का अंतर बढ़ता जा रहा है इसे दूर करने का सबसे सुंदर उपाय है धर्म तथा अध्यात्म, जहां किसी भी तरह का कोई भेद नही होता.  

Tuesday, January 8, 2013

कर्म किये जायें प्रतिपल हम


जनवरी २००४ 
योग क्या है ? प्रकृति के गुणों के वशीभूत हुए, जीवन में प्रतिपल हमसे कर्म होते हैं, कर्म करते हुए हम स्वयं को अथवा दूसरों को दुःख न दें तो कर्म बंधन में नही पड़ते, जैसे कुशा खींचते वक्त यदि सावधान रहें तो मूल सहित कुशा को प्राप्त कर सकते हैं, अन्यथा हाथ में चोट लगती है, “योगः कर्मसु कौशलम” अर्थात “योग कर्मों में कुशलता है” में कुशलता शब्द इसी कुशा से आया प्रतीत होता है. मकड़ी जैसे यदि असावधान रही तो अपने ही जाल में फँस जाती है, वैसे ही सुख के लिए किये हमारे कर्म कहीं दुःख न ले आयें, यही योग है. कर्म हमारे विकास की सीढ़ी बने और हम स्वयं निर्भार रहें,मधु पर बैठी मक्खी की तरह नहीं बल्कि शकर पर बैठी हुई मक्खी की तरह हम उनसे अलिप्त रहें. सृष्टि के आरम्भ से ही जिस यज्ञ की बात कृष्ण ने कही है, जिससे देवता पुष्ट होते हैं, वह  सत्कर्मों की ही है, जिससे हमारे भीतर दैवीय गुण पुष्ट होते हैं. ‘विधि, निषेध मय कलिमल हरणी’जब यमुना की ऐसी धारा भीतर बहेगी तो एक दिन एक दिन भक्ति की गंगा भी प्रवाहित होगी.