Tuesday, November 25, 2014

मुक्ति बिना यहाँ चैन नहीं

मई २००७ 
संत कहते हैं, चंड-मुंड, मधु-कैटभ तथा शुंभ-निशुंभ, रक्त बीज सब हमारे भीतर हैं. हृदय और मस्तिष्क ही चंड-मुंड हैं, अति भावुकता भी नहीं और अति बौद्धिकता भी नहीं, दोनों का संतुलित मेल ही हमारे जीवन को सुंदर बनाता है. राग-द्वेष ही मधु-कैटभ हैं और उनसे मुक्ति तब तक नहीं मिल सकती जब तक हमारी चेतना प्रेम में विश्राम न पा ले. जन्मों-जन्मों के संस्कार जो रक्त-बीज रूप में हमारे भीतर पड़े हैं, उनसे भी तभी मुक्त हुआ जा सकता है जब चेतना मुक्त हो. अभी तो तन, मन व चेतना तीनों एक-दूसरे से चिपके हुए हैं, एक को हर्ष हो तो दूसरा उसे अपनी पीड़ा मान लेता है, एक को हर्ष हो तो दूसरा उसे अपना हर्ष मान लेता है और होता यह है कि एक न एक को तो सुख-दुःख का अनुभव होता ही है, तो हर वक्त बेचारी चेतना बस परेशान, दुखी या ख़ुशी में फूली हुई रहती है, उसे कभी मन के साथ अतीत में जाकर पछताना पड़ता है तो कभी भविष्य में जाकर आशंकित होना पड़ता है, वह कभी चैन से रह ही नहीं पाती, नींद में भी मन उसे स्वप्न की झूठी दुनिया में ले जाता है. 

Friday, November 21, 2014

प्रेम बिना सब सूना सूना

मई २००७ 
हमारे भीतर प्रेम का अनंत खजाना है, करुणा का अथाह सागर है और सत्य तो हमारी आत्मा का स्वरूप ही है. हम इन्ही तत्वों से तो बने हैं, ये हमें कहीं से लाने नहीं, हमें इन्हें लुटाना है क्योंकि ये कभी खत्म न होने वाला भंडार है. हम देखेंगे जितना-जितना हम इसे बांटते हैं उतना-उतना यह भीतर से और स्रावित होता है. यही सेवा है. हम यदि आध्यात्मिक जीवन जीना चाहते हैं तो इस मार्ग के अलावा और कोई मार्ग नहीं. ज्ञान मुक्त करता है पर बिना प्रेम के वह मुक्ति अहंकार में बदल सकती है. ईश्वर के प्रति प्रेम हमें आनंद से भर देता है पर उस आनंद को जब हम भोगने लगते हैं तो फिर अटक जाते हैं, सेवा ही सच्चा मार्ग है, जिस पर हमें चलना है. 

Thursday, November 20, 2014

दर उसका है मंजिल जिसकी

मई-२००७  
ईश्वर विभु है और आत्मा अणु, दोनों एक ही तत्व से बने हैं. जिसे जीने की इच्छा हुई वह आत्मा जीव कहलायी तथा जिसे जीने की इच्छा नहीं है वही तो परमात्मा है. ‘वह है’ बस इसी तक हमें पहुंचना है अर्थात ‘मैं हूँ’ से ‘यह है’ तक का सफर ही साधना है. आत्मा का अनुभव पहले अपने भीतर होता है फिर उसी को सभी के भीतर हम देखते हैं. कृष्ण कहते हैं जो सबमें मुझे और मुझमें सबको देखता है वही वास्तव में देखता है. अहंकार की छुट्टी हो जाती है और हम उसके चंगुल से बच जाते हैं. अभी तक तो हम अपने कर्मों के द्वारा भटकाए जाते रहे हैं पर ईश्वर के द्वार पर आकर यह भटकन समाप्त हो जाती है. 


Tuesday, November 18, 2014

स्वयं ही स्वयं को तार सकेगा

मई २००७ 
इस जगत में हम जो भी करेंगे वह अंततः अपने ही साथ करते हैं, यह जगत एक प्रतिध्वनि है. उदास होकर जगत को देखो तो जगत भी उदास होकर देखता है. हम सोचते हैं क्रोध हम दूसरों पर कर रहे हैं, तो प्रार्थना करके मन को शांत कर लेते हैं. बुद्ध कह रहे हैं, कृत्य हमारा है, देर-सबेर लौटेगा, वर्धन छोटा-बड़ा हो सकता है पर लौटेगा जरूर. स्वयं से उपजा कोई भी विकार स्वयं को वैसे ही नष्ट कर देता है जैसे लोहे पर लगा जंग लोहे को. किसी भी कारण से जब दुःख आये तो उसे एकांत में झेल लेना ही उचित है, तो ही हम उस दुःख से निखर कर वापस आयेंगे, अन्यों को दोषी मानकर प्रतिकार करने वाला एक चक्र में फंस जाता है. जो कांटे हमने जन्मों-जन्मों में बोये हैं उनसे बच नहीं सकते, जगत तो उसे लाने में निमित्त भर बनता है.


Monday, November 17, 2014

भावना हो शुद्ध अपनी

मई २००७ 
संत कहते हैं, मृत्यु से हमें भयभीत होने की आवश्यकता नहीं है, हम तो हर पल उसकी ओर कदम दर कदम चल ही रहे हैं. हर श्वास जो बाहर जाती है, वह छोटी मृत्यु ही है. एक नियम के अनुसार हमारी मृत्यु होनी ही है, जो अवश्यम्भावी है उससे डरना व्यर्थ है. हमारे भीतर गुप्तचित्र है, जिसके आधार पर हमारा अगला जन्म होता है. इस प्रकृति में सभी कुछ स्वभाव से हो रहा है, पर अहंकार यह मानता है कि वह कर्ता है, यही कर्म बाँधता है. जो कर्म हम वर्तमान में बांधते हैं वह भविष्य में फल रूप में सामने आते हैं. मन, वचन, काया की जो भी क्रिया हम करते हैं वह सभी पूर्व के कर्मों के फलस्वरूप ही मिले हैं. सजग रहकर हम कर्म करने में बदलाव ला सकते हैं, हम इस जीवन में क्षण-प्रतिक्षण जैसा भाव बनाते हैं वही बंधता है, यदि भाव शुद्ध हो तो कर्म नहीं बँधते और हम मुक्ति की तरफ ही बढ़ते जाते हैं.


Sunday, November 16, 2014

कहत कबीर सुनो भई साधो

अप्रैल २००७ 
सद्गुरू हमें वाणी के द्वारा ज्ञान देते हैं, सही-सोच बनाने में सहायता करते हैं. एक साधक को चेतना के विकास के लिए श्रवण करना चाहिए. शास्त्रों को सुनने से जीवन में सुखद परिवर्तन आता है. अच्छा सुनना साधना की पहली सीढ़ी है. नितांत एकांत में भी हम सुनते हैं, प्रकृति से भी हम सुनते हैं. भद्र सुनने से हम भद्रता को संग्रहित करते हैं, अपने को सही रखना सीखते हैं. निर्विषयता, निर्विकारता तभी आती है, भ्रम और भय से मुक्ति मिलती है, जब हम सही सुनते हैं. जीवन में रस तभी आता है, उत्साह आता है, हमारा चिन्तन सकारात्मक होता है, मोह नष्ट होता है और अपने स्वरूप की झलक मिलती है, बोध जगता है. वाणी भगवान का बीज है, जो समय आने पर भक्ति का वृक्ष बनता है. जिसमें प्रेम के सुंदर फल लगते हैं, उन फलों में सेवा की मिठास होती है. चेतना को संकीर्णता से ऊपर उठाकर परमात्मा के निकट ले जाना सीखते हैं जो उस पर कृपा का जल बरसाते हैं, ज्ञान की खाद देते हैं और हृदय सुंदर भावनाओं का उपवन बन जाता है, वहाँ जाकर मन को विश्राम मिलता है, बुद्धि भी वहाँ शांत होकर सजगता को प्राप्त होती है.


मैं हूँ मंजिल...मैं ही मुसाफिर

अप्रैल २००७ 
सद्गुरु कहते हैं, मैं हूँ मंजिल, मैं ही सफर भी... मैं ही मुसाफिर हूँ..अर्थात हमारा मन व बुद्धि भी उसी आत्मा से निकले हैं, यानि वही हैं, तो जिसे आत्मा तक पहुंचना है वह मन रूपी यात्री भी आत्मा ही है और जिस साधन से वहाँ पहुंचता है वह भी तो उसी एक से ही निकला है. तो सफर भी वही है और लक्ष्य तो वह है ही, कितना सरल व सहज है अध्यात्म का रास्ता न जाने कितना पेचीदा बना दिया है इसे लोगों ने. सीधी सच्ची बात है कि हमारा मन जब अपना स्वार्थ साधना चाहता है, अपनी ख़ुशी चाहता है तो यह आत्मा से दूसरा हो जाता है और जब अपनी नहीं बल्कि समष्टि की ख़ुशी चाहता है, यह जान जाता है कि जगत एक दर्पण है, यहाँ जो हम करते हैं वही प्रतिबिम्बित होकर हमारे पास आता है तो यह खुशियाँ देना प्रारम्भ करता है, जिससे लौटकर वही इसके हिस्से में आती हैं. अहंकार को पोषने से सिवाय दुःख के कुछ हाथ नहीं आता क्योंकि अहंकार हमें अन्यों से पृथक करता है जबकि हम सभी एक ही विशाल सृष्टि के अंग हैं, एक-दूसरे पर आश्रित हैं, स्वतंत्र सत्ता का भ्रम पालने के कारण ही सुख-दुखी होते हैं, हम ससीम मन नहीं असीम आत्मा हैं !