Wednesday, October 9, 2013

छुप गया कोई रे

मार्च २००५ 
ईश्वर प्रेम स्वरूप है, आनन्द स्वरूप है, ज्ञान स्वरूप है. वही सबमें है सब उसमें हैं अथवा तो वही सब है. हम एक क्षण के लिए भी बल्कि एक क्षण के शतांश के लिए भी उससे पृथक नहीं हो सकते, वह है तो हम हैं फिर भी वह हमें दिखाई नहीं देता. हरेक कण में परमात्मा सुप्त अवस्था में है, इसे जगाना ही साधना है. सब जगह व्याप्त चैतन्य को रिझाना और आत्मसात करना है. जो प्रकट न हो फिर भी उससे प्रेम करना, यही तो श्रद्धा है. प्रेम भाव से तल्लीन हो जाना ही चैतन्य को कण-कण में जगाना है. वह तो पहले से है ही, पर हमें जब तक अनुभव न हो तब तक हमें उसे पुकारना है. हम जैसे सोये हुए से सचेत हो जाते हैं. भीतर की चेतना यदि पूर्ण जागृत न हो तो इन्सान सोया हुआ ही कहा जायेगा. जगा हुआ ही अपनी पूर्ण जिम्मेदारी ले सकता है, अपने कर्मों, वाणी तथा विचारों के प्रति सावधान होता है.  

Friday, September 27, 2013

उद्यम ही भैरव है

मार्च २००५ 
‘उद्यमः भैरवः’  पुरुषार्थ के लिए हमें जो प्रयत्न करना है, वही भैरव है. वही शिव है. शुभ कार्यों के लिए किया गया साधन परमात्मा का ही रूप है. हम साधन तो करते हैं पर असाधन  से नहीं बचते. २३ घंटे ५९ मिनट तथा ५९ सेकेण्ड यदि हम साधन करें और एक सेकंड भी असाधन में लग गये तो सारा साधन व्यर्थ हो जाता है. और यदि एक सेकंड ही साधन किया पर शेष समय असाधन न किया तो वह साधन हमारे लिए हितकारी होगा. जप-पूजा करने के बाद भी यदि भीतर शांति का अनुभव नहीं होता तो कमी साधन में नहीं बल्कि कारण हमारा असाधन है. संतजन कहते हैं, यह सम्पूर्ण संसार एक ही सत्ता से बना है. वही ज्ञानी है, वही अज्ञानी है. वही कर्ता है, वही भोक्ता है. हम साक्षी मात्र हैं. जाने-अनजाने सभी उसी ओर जा रहे हैं. वही हमारा मार्ग दर्शक है वही हमारा ध्येय है. यह सारा संसार उसी की लीला के लिए रचा गया है. 

Thursday, September 26, 2013

सुख-दुःख स्वयं जगाता है मन

मार्च २००५ 
ज्यादातर समय हमारा मन अतीत व भविष्य की उधेड़बुन में लगा रहता है, संतजन कहते हैं जो मन को साक्षी भाव से देख सकता है, उसके मन में स्थिरता आती है. शरीर की संवेदनाओं के प्रति सजग होते होते साधक को पता चलता है की स्थूलपना खत्म होता जा रहा है, तरंगे बनती हैं फिर खत्म होती हैं. क्रोध, लोभ आदि विकार भी स्थायी नहीं हैं, शरीर, मन, बुद्धि सभी बदल रहे हैं. कान में ध्वनि तरंग पड़ते ही भीतर भी एक तरंग उठती है. आंख में जब देखते हैं तो भीतर एक तरंग उठती है. यदि दृश्य सुखद हुआ तो मन उसे पसंद करने की तरंग जगाता  है, यदि दुखद हुआ तो दुखद संवेदनाएं जगाता है. ऊपर से लगता है हम दुखद या सुखद घटना के प्रति प्रतिक्रिया जगाते हैं पर वास्तव में संवेदनाओं के प्रति ही प्रतिक्रिया करते हैं. गहराई में जाकर हम देखते हैं कि दुःख या सुख हम अपनी प्रतिक्रियाओं के कारण ही अनुभव करते हैं, जब हम यह देखते हैं की ये संवेदनाएं क्षणभंगुर हैं तो हम राग-द्वेष से मुक्त होने लगते हैं. हम जानने लगते हैं कि विकार जगते ही मन की शांति भंग होती है, तब हम विकार से मुक्त होने लगते हैं. 

Wednesday, September 25, 2013

तप कर कुंदन होवे स्वर्ण

मार्च २००५ 
तितिक्षा के बिना प्राप्त किया हुआ ज्ञान सफल नहीं होता, सुविधापूर्ण जीवन जीने की इच्छा हमें तप करने से रोकती है, कष्ट से घबराना सिखाती है, लेकिन इससे हमारे भीतर की शक्तियाँ बाहर नहीं आ पातीं. हमारे शरीर में शक्ति केंद्र हैं, जिनमें अनंत शक्ति है. मूलाधार केंद्र में जड़ता तथा चैतन्य दोनों हैं. जड़ता का अनुभव हर कोई करता है पर चेतना का कोई तप करने वाला ही. स्वाधिष्ठान केंद्र में काम तथा सृजन करने की क्षमता है. मणिपुर में लोभ, इर्ष्या, संतोष तथा उदारता हैं. हृदय में प्रेम, द्वेष तथा भय हैं. विशुद्धि चक्र में कृतज्ञता तथा दुःख की भावना शक्ति है. आज्ञा चक्र में ज्ञान तथा क्रोध व सहस्रहार में आनन्द ही आनन्द है. हम प्रतिपल सजग रहें तो नकारात्मक वृत्तियों के शिकार नहीं होंगे, तब सकारात्मक को पनपने का अवसर मिलेगा ही. सजगता भी तप है और विनम्रता भी तप है. देह को सदा सुख-सुविधाओं में रखकर हम अपने भीतर रहने वाले चैतन्य देव को जागृत होने का अवसर नहीं देते, वह हमारे माध्यम से प्रकट होना चाहता है, अपना अनंत प्रेम हमें देना चाहता है. हम उसकी आवाज को अनसुना कर देते हैं. हम पत्थरों को थामते हैं, हीरों को त्याग देते हैं. निद्रा के तामसी सुख के पीछे ध्यान का सात्विक सुख त्याग देते हैं. स्वार्थी होकर सेवा के महान व्रत से दूर रहते हैं. देह बुद्धि से ऊपर उठते ही हमारा जीवन खिलने लगता है. इसके लिए तप तो करना ही होगा.

खाली हुआ जो वही भरा

मार्च २००५ 
निर्मलता शांति को प्रकट करती है. आकाश यदि घनमालाओं से आवृत हो तो इतना विशाल प्रतीत नहीं होता, शुभ्र गगन अनंत शांति को प्रकट करता है. उसी तरह चिदाकाश भी जब वृत्तियों से रहित होता है तो निर्मलता को प्रकट करता है. सहज प्रेम भी उसी से फूटता है. भक्त फूल की तरह, नदी व सूर्य की तरह देना चाहता है, वह अपना आप खाली कर देना चाहता है, क्योंकि वह उसमें अनंत को भरना चाहता है, एक तरफ वह खाली होता जाता है और दूसरी तरफ भरता जाता है. पूर्ण मदा पूर्ण मिदं, पूर्णात पूर्ण मुदच्यत...अपने जीवन में जीता है. सत्य को अपने जीवन में घटते देखता है. शास्त्रों में जो लिखा है, वह अनुभूत सत्य है, जब भक्त के जीवन में वह घटित होता है तो शास्त्र के प्रति उसका प्रेम और बढ़ जाता है. ईश्वर की यह सृष्टि कितनी अद्भुत है.

Tuesday, September 24, 2013

एक संपदा सबके भीतर

मार्च २००५ 
भ्रान्ति और सत्य का पता तब तक नहीं चलता  जब तक हम चेतना के प्रति सचेत नहीं होते. धर्म का आदि बिंदु अतीन्द्रिय चेतना है, जब तक पदार्थ से परे आत्मा की चेतना का ज्ञान नहीं होगा तब तक हम द्वंद्व के शिकार होते रहेंगे. हम छिलकों से ही संतुष्ट न हो जाएँ, मूल को भी पायें, तब जो परिवर्तन हमारे भीतर होगा वह अतुलनीय होगा. मुक्ति का आरम्भ यहीं से होता है. हम यदि सुख के लिए पदार्थ को ही साधन बनाते हैं तो दुखी होने के लिए तैयार रहना होगा. यदि अक्षय सुख का स्रोत जो हमारे भीतर है, उसका अनुभव करते हैं तो जीवन में परम भक्ति का आगमन होता है. परमात्मा की शक्ति व प्रेम का अनुभव हर क्षण हमें होने लगता है. 

Sunday, September 22, 2013

सागर की पुकार सुनें जब

हम शुद्धात्मा हैं, मन पराधीन है, उस पर हमारा नियन्त्रण नहीं है, मन में न जाने कितने जन्मों के संस्कार छिपे हैं, कितने विचार उसमें उठते हैं, संकल्प-विकल्प की लहरें व बुदबुदे सभी उठते हैं पर वे सब सतह पर हैं, आत्मा सागर है, उसका स्वभाव है स्थिरता. सागर द्रष्टा है. ध्यान में हम सतही मन से नीचे गहरे सागर के साथ एक हो जाते हैं, तब मन को उसी तरह देखते हैं जैसी किसी और को देख रहे हों. धीरे-धीरे विचार भी खो जाते हैं और दृष्टा अपने आप में रह जाता है, अखंड मौन का अनुभव जब साधक को पहली बार होता है तो लगता है जैसे कोई निधि मिल गयी हो. ध्यान पूर्ण जागृति का नाम है, मन सापेक्ष सत्य है, आत्मा निरपेक्ष सत्य है. वहाँ से लौटकर हमें निरंतर यह अनुभूति रहती है कि जो कुछ जगत में है एक मात्र वही सत्य नहीं है, बहुत कुछ है जो दिखाई नहीं पड़ता वह भी है. तब हम जगत में उलझते नहीं, मोह के शिकार नहीं होते. ऐसे आनन्द की अनुभति करते हैं जो बाहरी वस्तु, व्यक्ति या परिस्थिति पर आधारित नहीं है.