मार्च २००५
ईश्वर प्रेम
स्वरूप है, आनन्द स्वरूप है, ज्ञान स्वरूप है. वही सबमें है सब उसमें हैं अथवा तो
वही सब है. हम एक क्षण के लिए भी बल्कि एक क्षण के शतांश के लिए भी उससे पृथक नहीं
हो सकते, वह है तो हम हैं फिर भी वह हमें दिखाई नहीं देता. हरेक कण में परमात्मा सुप्त
अवस्था में है, इसे जगाना ही साधना है. सब जगह व्याप्त चैतन्य को रिझाना और
आत्मसात करना है. जो प्रकट न हो फिर भी उससे प्रेम करना, यही तो श्रद्धा है. प्रेम
भाव से तल्लीन हो जाना ही चैतन्य को कण-कण में जगाना है. वह तो पहले से है ही, पर
हमें जब तक अनुभव न हो तब तक हमें उसे पुकारना है. हम जैसे सोये हुए से सचेत हो
जाते हैं. भीतर की चेतना यदि पूर्ण जागृत न हो तो इन्सान सोया हुआ ही कहा जायेगा.
जगा हुआ ही अपनी पूर्ण जिम्मेदारी ले सकता है, अपने कर्मों, वाणी तथा विचारों के
प्रति सावधान होता है.