Saturday, May 17, 2014

एक भरोसा राम का

मार्च २००६ 
साधक को संदेह से अवश्य बचना चाहिए, हर कीमत पर बचना चाहिए, हम संदेह तो जल्दी कर लेते हैं पर भरोसा करने में बहुत देर लगा देते हैं, जिनको हम प्रेम करते हैं उन्हीं पर जब हम संदेह करते हैं तो हम स्वयं पर ही अविश्वास कर रहे होते हैं. एक बार जिसे अपने हृदय का स्वामी बना लिया, तब उस पर संदेह करना अपने हृदय पर संदेह करना ही हुआ. सत्य को कभी सिद्ध करना ही नहीं होता, जिसे परीक्षा से गुजरना पड़े वह सत्य नहीं है. सत्य तो स्वयं सिद्ध है और जब यह भीतर प्रकटता है तो सारे भ्रम मिट जाते हैं, एक सजगता भीतर रहती है जो किसी विवाद को प्रश्रय नहीं देती, तब सहज ही समाधान होने लगता है. साधक की दृष्टि चेतन पर होती है, तब स्वयं पर भरोसा होने लगता है, सभी के भीतर उसी सत्य को देख पाने की दृष्टि भी जगती है. जगत पर तब प्रेम ही उमड़ता है, दोष नहीं दीखता, तब जगत लीला के रूप में खुलता जाता है.

Thursday, May 15, 2014

काँधे पर जो गठरी भारी

मार्च २००६ 
अज्ञान दशा में किये गये सारे कर्म बंधनकारी हैं. हमारे कर्मों की गठरी जितनी छोटी होगी मुक्ति उतनी ही जल्दी मिलेगी, ज्ञान मिलने के बाद यह तो तय है कि हमारी गठरी बढ़ती नहीं है, घटती जाती है, तब हमारा अहंकार जो पहले सजीव था, निर्जीव हो जाता है, हम संसार में सभी कुछ करते हैं पर कर्ता भाव नहीं रहता. उसी दशा में सच्चा पुरुषार्थ होता है. मुक्ति के बिना भक्ति भी सम्भव नहीं. हम जानते हैं, मृत्यु निश्चित है, और यह भी कि ऊपर-ऊपर से भेद भले ही हो मूलतः हम एक हैं, सभी के भीतर एक ही चेतन सत्ता व्याप्त है, हम इसी प्रकृति के अंश हैं, जो अपना तादात्मय  प्रकृति के साथ करता है उसे दोषों का भागी होना ही पड़ेगा किन्तु जो स्वयं को चेतना जानता है वह मुक्त है, आकाश की तरह, हवा की तरह, उसमें कोई भी अभाव नहीं रहता, वह नित्य है, सदा है, आनन्द रूप है. 

Wednesday, May 14, 2014

मित्र वही जो बने सहायक

मार्च २००६ 
जीवन में कोई एक मंत्र हो, एक मित्र हो और एक सूत्र हो जो हमारी रक्षा करे. मंत्र, मित्र तथा सूत्र तीनों एक भी हो सकते हैं, एक ही सद्गुरु में समा सकते हैं जो हमारी रक्षा करता है. आत्मा भी एक मंत्र है, मित्र भी वह है, और सूत्र तो वह है ही. जो आत्मा में वास करता है सदा उसकी रक्षा होती है. ईश्वर भी हमारा मित्र है, उसका नाम मंत्र है, उसका ‘ध्यान’ ही सूत्र है. हमारा नेत्र भी मंत्र, मित्र तथा सूत्र हो सकता है. हमारी दृष्टि जितनी पवित्र होगी उतनी ही हमारी रक्षा होती रहेगी. दृष्टिकोण सकारात्मक हो, भाव उच्च हों तो हमारा अनिष्ट कैसे हो सकता है. हमारी दृष्टि जब धूमिल हो जाती है, चीजों को हम उनके सही रूप में नहीं देखते तभी हमारा अंतःकरण मलिन होता है. मूल रूप में सब पवित्र है. हमारा जीवन आनंद के लिए है, प्रभु को प्रेम करते करते त्याग करते हुए ग्रहण करने के लिए है न कि संसार के पीछे भागकर दुखी होके जीने के लिए. 

Monday, May 12, 2014

सहज हुए सब कर्म करें

फरवरी २००६ 
मिथ्या पुरुषार्थ कर्मों को बाँधने वाला है, वास्तविक पुरुषार्थ कर्मों से हमें छुड़ाता है. आनन्द का प्रदाता है, और यह तब होता है जब हम स्वयं को जान लेते हैं. तब बाहर से सारे कार्य करते हुए भी हम भीतर से विरक्त ही रहते हैं. कर्तृत्व व भोक्तृत्व तब शेष नहीं रहता. बाहर हम जो भी कर्म करते हैं वे तो फल हैं, भीतर जो भाव बनते हैं, वे ही बाँधते हैं. हमारे भीतर के भाव ही भावी को जन्म देते हैं. आत्मा में जो स्थित रहता है, उसके जीवन में जो भी घटता है वह सहज ही स्वीकार्य हो जाता है. उसके भीतर कर्मों की होली जलती है और बाहर प्रेम का रंग चढ़ता है. 

मिल कर भी जो कभी न मिलता


संतजन कहते हैं, शिव तत्व सृष्टि के कण-कण में है, वह हमारे भीतर भी है, उसे जगाना ही वास्तविक पूजा है. जब मन में कामनाओं, वासनाओं तथा महत्वाकांक्षाओं का जाल न फैला हो, मन खाली हो तब वह शिव तत्व जो पहले से ही वहाँ है, प्रकट हो जाता है. हमारी शुद्ध चेतना उसी से बनी है. वह प्रेम है, सौन्दर्य है, कल्याणकारी है, अखंड है, निर्दोष है, शाश्वत है, निर्द्वन्द्व है, ज्ञान स्वरूप है. उस शिव तत्व को एक बार जान लेने के बाद उसका विस्मरण नहीं होता, उसके रहस्य धीरे-धीरे करके खुलते हैं लेकिन कभी पूरे नहीं होते. वह जान कर भी जाना नहीं जाता, वह अनुभव की वस्तु नहीं, शब्दों में नहीं आता, पर एक बार जिसे उसकी झलक भी मिल गयी वह स्वयं को तृप्त अनुभव करता है. पर यह तृप्ति उसकी प्यास को बढ़ाती है, जगत की प्यास को मिटा देती है. 

Friday, May 9, 2014

आ लौट के आजा मेरे मन

फरवरी २००६ 
आत्मा की सुगंध में जीना मानो प्रभु के आगे पुष्प भेंट करना है, अपनी आत्मा में रहकर व्यवहार करना ही उसकी सच्ची आराधना है. हमारा मन ‘सैलानी’ मन तो नहीं है, इसका ध्यान रखना होगा. अपने से अभिन्न परमात्मा जो अभी दूर लगता है, दूर है नहीं. हमारे भीतर वही बन्धु रूप में सदा चिदाकाश स्वरूप ही रहता है. कर्मों के बंधन से हमें मुक्त होना है. उसकी उपस्थिति का अनुभव होते ही संचित कर्म नहीं रहते, नये हम बांधते नहीं. भक्ति हमें मुक्ति प्रदान करती है और अहंकार से मुक्ति, भक्ति में लगाती है. 

Thursday, May 8, 2014

एक उसी के नाते सब है

फरवरी २००६ 
जो देहातीत है, शब्दातीत है, गुणातीत है, वह परमात्मा हमारे अनुराग का पात्र हो. यह सभी का अनुभव है कि संसार के प्रति राग दुःख का जनक है था दुःख से मुक्ति की आकांक्षा परमात्मा की ओर जाने की सीढ़ी है. परमात्मा की ओर की जाने वाले यात्रा जीवन को एक उत्सव में बदल देती है और तब संसार भी अपना बन जाता है.