Sunday, July 19, 2020

कोरोना से जो बचना चाहे


वर्तमान समय, जीवन जब एक तरफ कोरोना के कारण आपदा में घिरा है तो दूसरी ओर मानवीय शक्ति और क्षमता को परखने का स्वर्ण काल भी है. जीवन को किस तरह बचाएं इसके लिए दुनिया भर में वैज्ञानिक शोध कार्य कर रहे हैं. कम साधनों में किस तरह जीवन चलाएं इसके प्रति भी लोग सजग हो रहे हैं. भौतिकता को त्याग सादा जीवन उच्च विचार की परिपाटी पर चलने का समय भी यही है. कितने ही व्यवसाय बन्द हो चुके हैं, साथ ही कार्य के नए - नए क्षेत्र भी खुल रहे हैं. निराश होकर उदास होने का समय नहीं है, यह सजग और सतर्क रहकर जीवन को इस प्रकार जीने का समय है कि कम से कम ऊर्जा की खपत हो और अधिक से अधिक साधन बचाये जा सकें. वैज्ञानिकों की मानें तो कोरोना काल अभी लम्बा खिंचने वाला है. देश को अधिक दवाइयों, स्वास्थ्यकर्मियों व अस्पतालों की जरूरत होगी, साथ ही देशवासियों को अधिक मनोबल और मानसिक शक्ति की भी जरूरत होगी. नियमित जीवनशैली अपना कर, जिसमें योग, ध्यान हो, रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने वाले आहार हों तथा समाज व देश के प्रति अपना कर्त्तव्य निभाने की ललक हो तो हम इस विपदा काल में भार नहीं बनेंगे बल्कि भार वाहक बन सकते हैं. 

Saturday, July 18, 2020

सत्यं शिवं सुंदरं


ईश्वर को सत्य, शिव और सुंदर नाम दिए गए हैं, इसका अर्थ हुआ जो सत्य है वही कल्याणकारी है और वही सुंदर है. व्यवहारिक जीवन में भी हम इन तीनों तत्वों के महत्व और उपयोगिता को नित्यप्रति अनुभव करते हैं. असत्यभाषी पर कोई विश्वास नहीं करता, जो अपनी बात पर कायम नहीं रहता ऐसे व्यक्ति को जीवन में असफलता ही हाथ लगती है. सौंदर्य के प्रति हर मानव के भीतर सहज ही आकर्षण होता है. सुंदरता किसे नहीं भाती। शिशु के मुखड़े पर छायी मुस्कान उसकी आंतरिक सुंदरता को दर्शाती है, धीरे-धीरे रोष, लालसा, दुःख आदि के भाव भी चेहरे पर झलकने लगते हैं और एक वयस्क व्यक्ति का चेहरा वैसा सहज और सुंदर नहीं रह जाता. संतों के चेहरे पर वृद्धावस्था में भी एक अलौकिक सौंदर्य दिखाई देता है. नन्हा बालक सत्य में स्थित होता है, अभी उसे असत्य का बोध ही नहीं. सन्त सदा जगत के कल्याण की बात करते हैं, इसीलिए दोनों में सौंदर्य के दर्शन होते हैं। 


Friday, July 17, 2020

तीन गुणों का जो साक्षी


भगवद्गीता में कृष्ण ने कहा है, गुण ही गुणों में वर्तते हैं. हम अपनी सात्विक, राजसिक, तामसिक प्रकृति के अनुसार कर्मों को करते हैं. यही गुण हमारे कर्मों का कारण बनते हैं और हम स्वयं को कर्ता मानकर उनके द्वारा प्राप्त सुख-दुःख का भोग करते रहते हैं. यह क्रम जाने कब से चलता आ रहा है. अंतर्मुखी होकर जब साधक इस सत्य को देखता है तो गुणातीत होने की तरफ उसके कदम बढ़ते हैं. जब साक्षी भाव बढ़ने लगता है तो वह गुणों के द्वारा विचलित नहीं होता. यदि तमस के कारण भीतर प्रमाद है तो वह उसके वश में नहीं होता, मन यदि चंचल है तो यह जानकर कि रजोगुण बढ़ा हुआ है वह ध्यान का प्रयोग करता है. सत्व में स्थित होने पर शांति का भी भोक्ता नहीं बनता बल्कि स्वयं को सदा ही अलिप्त देखता है. 

Thursday, July 16, 2020

मन को तारे मन्त्र वही है

निशब्द परमात्मा तक पहुंचने के लिए शब्दों की एक नाव बनानी पडती है, पर अंततः शब्द भी छूट जाते हैं क्योंकि वह शब्दातीत है. मंत्र इसी नाव का नाम है. हमारे मन में असीम सामर्थ्य है जो हम चाहें उसे वह अनुभूत करा सकता है. मन की वृत्ति या विचार में यदि ईश्वर का नाम हो,  तो वही प्रगट होगा. यह जप सतत बना रहे तो इष्ट हमारे मन का स्वामी बन जाता है, उसी का अधिकार हृदय पर हो जाता है और इसके बाद समता स्वयं ही प्राप्त हो जाती है. यदि बाहर कोई भी विपरीत परिस्थिति आती है और मन विचलित होता है तो मन्त्र का स्मरण तुरन्त सहज अवस्था में पहुँचा देता है.  मन में जो नकारात्मक विचार आयें उन्हें ठहरने न देना और जो सकारात्मक विचार आयें उन पर ही ध्यान केंद्रित करना साधक के लिये सहज हो जाता है. 

Tuesday, July 14, 2020

जीवन का जो पाठ पढ़ेगा

जीवन एक पाठशाला ही तो है, यहाँ हर दिन, हर किसी को, कोई न कोई परीक्षा देनी होती है. जब कोई देख न रहा हो तब भी कोई देखता है कि जब करुणा दिखाने का वक्त था तो हम कितने उदार थे. अचानक कोई विपदा आ पड़ी तो हमने कितनी शीघ्रता से उसका समाधान ढूंढ लिया. सामने वाला हमसे सहमत न हो रहा हो तो झट उसके दृष्टिकोण से हम वस्तुओं को भांप सकते हैं या नहीं इसकी भी परख होती है. जब देह को कोई रोग सताये तो हम कितनी जल्दी साक्षी भाव में आकर स्वयं को दर्द से बचा ले जाते हैं. जीवन में आ रहे परिवर्तन को कितनी आसानी से हम स्वीकार कर लेते हैं और दृढ़ता से उसका सामना करते हैं. कुछ भी हो जाये हमारी आशा की डोर टूटी तो नहीं, इसकी भी परीक्षा होती है. परमात्मा के प्रति आस्था और श्रद्धा में रंच मात्र भी कमी तो नहीं आती, कृतज्ञता की भावना ने हमारे अंतर को आप्लावित तो कर दिया है न. असीम धैर्य और आत्मविश्वास की पूंजी घट तो नहीं रही. जैसा जीवन  हम चाहते हैं उसी के अनुरूप हमारे कर्म भी हो रहे हैं या नहीं. ये सभी छोटी-छोटी बातें यदि जीवन में हैं तो अवश्य ही हम जीवन की पाठशाला से सफल होकर जाने वाले हैं. 

Sunday, July 12, 2020

निज स्वरूप को जाना जिसने

अविद्या का आवरण हमारे स्वरूप को हमें देखने नहीं देता. देह, मन, बुद्धि को ‘मैं’ मानना ही अविद्या है. हम स्वयं को जैसा मानेंगे वैसा ही अपना स्वरूप हमें प्रतीत होगा. यदि हम देह को ही मैं मानते हैं तो सदा ही भयभीत रहेंगे, क्योंकि देह निरन्तर बदल रही है और एक दिन मिट जाएगी. यदि मन को अपना स्वरूप मानते हैं तो सदा ही कम्पित होते रहेंगे क्योंकि मन भी इस निरंतर बदलते हुए संसार से ही बना है, जैसा वातावरण, जैसे शिक्षा उसे मिलती है वह उसी को सत्य मानकर उसी के अनुसार चलता है. जब हम बुद्धि को ही अपना स्वरूप मानेंगे तो सदा ही मान-अपमान के द्वंद्व में फंसे रहेंगे क्योंकि अपनी बुद्धि से उपजे विचार, धारणा आदि को ही हम सत्य मानेंगे और दूसरों के विचारों से मतभेद पग-पग पर होता ही रहेगा. इसके साथ-साथ ही देह, मन और बुद्धि से किये गए कार्यों का हमें अभिमान भी बना रहेगा. 

खाली होगा मन जब अपना

सन्त कहते हैं  “न अभाव में रहो, न प्रभाव में रहो बल्कि स्वभाव में रहो”. अभाव मानव का  सहज स्वभाव नहीं है क्योंकि वह वास्तव में पूर्ण है. अपूर्णता ऊपर से ओढ़ी गयी है, और चाहे कितनी ही इच्छा पूर्ति क्यों न हो जाये यह मिटने वाली नहीं. हम मुक्त होना चाहते हैं जबकि मुक्त तो हम हैं ही, बंधन खुद के बनाये हुए हैं, ये प्रतीत भर होते हैं. प्रेम हमारा सहज स्वभाव है, हम उसी से बने  हैं. अज्ञान वश जब हम इस सत्य को भूल जाते हैं तथा प्रेम को स्वार्थ सम्बन्धों में ढूंढने का प्रयास करते हैं तो दुःख को प्राप्त होते हैं.  हमें अपने जीवन के प्रति जागना है. कुछ बनने की दौड़ में जो द्वंद्व भीतर खड़े कर लेते हैं उसके प्रति जागना है.  मन को जो अकड़  जकड़ लेती है, असजगता की निशानी है. खाली मन जागरण की खबर देता है , क्योंकि मन का स्वभाव ही ऐसा है कि इसे किसी भी वस्तु से भरा नहीं जा सकता इसमें नीचे पेंदा ही नहीं है, तो क्यों न इसे खाली ही रहने दिया जाये. मुक्ति का अहसास उसी दिन होता है जब सबसे आगे बढ़ने की वासना से मुक्ति मिल जाती है.