Tuesday, September 18, 2012

अति सूक्ष्म है उसकी वाणी


अगस्त २००३ 
यदि हमारे मन में कोई ऐसी बात किसी के लिए आती है जो उसके सम्मुख नहीं कह सकते तो समझना चाहिए कि मन में विकार जगा है, मन में जगा हर विकार हमें बताता है कि अभी हम प्रभु से कितनी दूर हैं, और जब हम गलती को दोहराते हैं तो वह जड़ पकड़ लेती है तब मन की संवेदनशीलता धीरे-धीरे कम होने लगती है और हम प्रभु की उपस्थिति को भी भूल जाते हैं. हमें तो हर क्षण उसकी अलख जगानी है, अपने हृदय को कोमल बनाना है, इतना कोमल कि सूक्ष्मतर विकार भी उसे आघात पहुँचाए और हम सजग हो जाएँ. अपने हृदय पर पड़ी ईश्वर की छुअन भी हम तभी अनुभव कर पाते हैं अन्यथा तो वह इतना निकट है कि उसकी आवाज हमें स्पष्ट सुनाई देनी चाहिए. उसकी उपस्थिति का भाव होता रहे तो मन कितना पवित्र महसूस करता है. मनसा, वाचा, कर्मणा हमें सजग रहना ही होगा, कहीं भी चूके तो सिवा पछतावे के कुछ भी हाथ आने वाला नहीं है. प्रभु के पवित्र नामों का उच्चारण करते समय जब मन आँसुओं से भीग जाये कि यह वही जिह्वा है जिससे न जाने कितने अपशब्द हमने बोले हैं और उसी का उपयोग हम ईश्वर के नामों का उच्चारण करने में करते हैं, तो स्मरण आए, मन तो और भी सूक्ष्म है. खाली मन ही उसका चिंतन कर सकता है.

Sunday, September 16, 2012

कहते हैं किसको मुक्ति


अगस्त २००३ 
आजादी का अर्थ क्या है, आजादी यानि हमारे मन की आजादी, कोई बंधन नहीं, पूर्ण मुक्त, जीवन मुक्त, न इच्छाओं का बंधन न कामनाओं का, न लोभ का, न मोह का न ईर्ष्या का न अहंकार का. हम हैं ही क्या इस विशाल ब्रह्मांड के सम्मुख और हममें या अन्य किसी में अंतर ही क्या है तो हम किसका अहंकार करें और किससे  ईर्ष्या करें. यह जगत हमें दे ही क्या सकता है जो हमारे पास पहले से ही नहीं है, तो हमें लोभ भी क्यों हो. कौन यहाँ पूर्ण है तो क्रोध किस पर करें. जब हम ही अपूर्ण हैं तो हमें क्या अधिकार है कि क्रोध करें. यही सारे विकार ही तो हैं जो हमें गुलाम बनाते हैं. सद्गुरु हमें आजाद करते हैं, सारे बंधनों से मुक्ति दिलाते हैं. हम बिन पंखों के मुक्त गगन में उड़ने लगते हैं. हम उस देश के वासी हैं जहां रोग नहीं, शोक नहीं, आनंद ही आनंद है. जहां करुणा है, प्रेम है, जहां अपनत्व है, जहां अद्वैत है, जो ब्रह्म का देश है, जो कृष्ण का वृन्दावन है, गोकुल है, जहां प्रेम की वंशी बजती है. जहां विकारों के असुरों का कृष्ण नाश कर देते हैं. जहां अंतर में मन की राधा का मन के कृष्ण से निरंतर मिलन होता है. ऐसी मुक्ति ही वास्तविक मुक्ति है जिसे एक बार पाने के बाद पुनः हमें गुलाम नहीं बनना है. मुक्ति का एक बार स्वाद जो ले ले फिर उसे सोने की जंजीरें भी बांध नहीं पाएंगी वह तो अमृत पान कर चुका है फिर क्यों पोखर के पास जायेगा. संत तभी हमें साधना, सेवा, सत्संग और स्वाध्याय के मार्ग पर चलने का परामर्श देते हैं, यही पथ मुक्ति का पथ है.

Friday, September 14, 2012

बने बांसुरी कान्हा की जो


अगस्त २००३ 


शंकर कहते हैं, भज गोविन्दं, भज गोविन्दं भज गोविन्दं मूढ़ मते...वे मानव को मूढ़ कहते हैं, कितना झकझोरता है उनका वचन, संत निर्भीक होता है, उसे समाज से कुछ तो चाहिए नहीं वह  सिर्फ देता है, और जो देना जनता है वह डांट भी सकता है. हम वास्तव में कितने धार्मिक हैं इसका इसका पता संत के सम्मुख जाने से ही चलता है. उनकी बातें एक आईना हैं जिसमें हमें अपना वास्तविक चेहरा दिखाई देता है. वह सत्यस्वरूप हैं और उनके सम्मुख जाते ही हमारा झूठ उजागर हो जाता है. हम जो प्रेम से अपने अंतर को भर लेते हैं उनके प्रति, ईश्वर के प्रति, क्यों कठोर हो जाते हैं जब जगत से व्यवहार करते हैं. ईश्वर को माता-पिता मानकर आराधनाएं तो करते हैं, पर वास्तविक माता-पिता की सेवा से क्यों घबराते हैं. आदर्शवादिता की बातें तो बहुत करते हैं पर जीवन में उन्हें उतारने से पीछे हट जाते हैं. सद्गुरु उस बांसुरी की तरह हैं जो स्वयं पीड़ा सहकर राग उत्पन्न करती है, वह कटती है, तपती है, विरह की पीड़ा सहती है, तभी कृष्ण के अधरों से लगती है. वैसे ही संत संत होने पूर्व विरह की आग में जलते हैं, तभी प्रभु का दीदार होता है, और उसके मुख बन जाते हैं, वह उसकी तरफ से बोलते हैं. हमारे जीवन में स्वार्थ नहीं रहता, झूठा गर्व नहीं रहता, हम भी प्रभु का साधन बन जाते हैं वह हमसे काम करवाने लगता है, और हमारे कुशल-क्षेम का भार अपने ऊपर ले लेता है.

Thursday, September 13, 2012

वही हमें पथ दिखलाता है


जिसने परम लक्ष्य तय कर लिया है, वह हर परिस्थिति में समभाव बनाये रखेगा, हर स्थिति को अपने लक्ष्य की ओर ले जाने वाला बनाएगा. लक्ष्य का स्मरण कर्त्तव्य से च्युत नहीं होने देता. इस जगत में हम अकेले ही आए हैं, और अकेले ही जाना है यह बीच का जो वक्त है, वही हमें मिलजुल कर बिताना है पर याद इतना ही रखना है की यह बीच का समय हमारी सारी ऊर्जा को ही न ले ले,  हमें अंतर में ध्यान के अमृत को पीना है. शरीर में होने वाली संवेदनायें किसी न किसी भावना की द्योतक हैं, यदि संवेदना को देखें और देखते-देखते वह खत्म हो जाये तो वह भावना भी नहीं रहती. ध्यान में तभी हमारी सभी नकारात्मक भावनाएं खत्म होने लगती हैं, और हम साफ-स्वच्छ बाहर निकल आते हैं. ध्यान एक तरह से स्नान ही हुआ न, भीतरी स्नान. फिर जब मन विधायक हो जाता है तब प्रज्ञा प्रकट होती है. अभी रास्ता लम्बा है पर रास्ता भी कितना मोहक है, अद्भुत है, परमात्मा का संग इसे और भी मोहक और आनन्दप्रद बना देता है.

Wednesday, September 12, 2012

झर जाता है फूल यहाँ ज्यों


अगस्त २००३ 
ईश्वर का एक नाम काल भी है, काल अर्थात मृत्यु जो सभी के लिए तय है, यदि हम मृत्यु का स्मरण सदा हृदय में बनाये रखें तो कभी अभिमान के शिकार नहीं हो सकते. संसार में वैसे ही यदि कोई रहे जैसे फूल रहता है, जब तक डाली पर है, जगत को देता है  फिर चुपचाप झर जाता है, हम भी जब तक यहाँ हैं, जगत को कुछ न कुछ दें फिर जब जाने का समय आए तो शांत भाव से चले जाएँ, क्योकि जाना भी तो वहीं है जहां से हम आए हैं. जीवन मौन से ही शुरू होता है और मौन में ही समाप्त होता है, मौन इसलिए अतिशय प्रिय है, सन्नाटे और शांति में सुकून मिलता है, जैसे कोई मौन में भी बात कर रहा हो. बाहर का शोर भीतर हलचल मचा देता है, जैसे भीतर का शोर बाहर की अशांति का कारण भी होता है. भीतर का मौन बाहर की व्यवस्था का कारण भी होता है. हमें शांति का अनुभव करना हो तो भीतर के मौन में उतरना ही होगा, वहीं से संगीत फूटता है और वहीं से शब्दों का जन्म होता है, बाहर जो विविधता प्रतीत होती है वह ऊपर-ऊपर ही है, गहरे में सब एक है, वह एक ही संतों का आराध्य है, वह एक परब्रह्म जो इस समस्त मायाजाल के पीछे है. वह अटूट मौन में ही है, वहाँ कोई चतुराई काम नहीं आती. 

सत्यं-शिवं-सुन्दरं


अगस्त २००३ 
सुख-दुःख से परे, मान-अपमान से ऊपर, इच्छा-अनिच्छा के द्वंद्व से मुक्त मन कितना सुंदर है. सत्यं-शिवं-सुन्दरं का जब जीवन में प्रवेश हो संभवतः तभी वास्तविक जीवन शुरू होता है. सत्य ही शिव है, और जो कल्याणकारी है, वही सुंदर है, यह जगत हमारे मन का प्रतिबिम्ब ही दिखाता है. जब मन शांत हो, सौम्यता को धारण कर चका हो, जगत में रची गयी सैकड़ों लीलाएं चाहे वे सुखद हो अथवा दुखद, अब एक सी प्रतीत होती हैं. घड़ी-घड़ी मन भीतर आ जाता है, उसी केन्द्र की ओर जो उसका मूल है, बाहर के कार्यों को करने के लए उसे सप्रयास बाहर लाना पड़ता है. इसे ही अमनी भाव कहते हैं. मौन से कैसी प्रीति हो जाती है. वाणी के मौन के साथ-साथ भीतर का मौन.. क्योंकि अब कोई चाह शेष नहीं रहती, जब इस जगत से विशेष कुछ मिलने वाला नहीं है जो पहले से ही हमारे पास नहीं है तो बाहर क्यों जाएँ. भीतर कोई मिल गया है जिसे जानकर ऐसा प्रतीत होता है कि कुछ पाना शेष नहीं रह गया है. सब कुछ इतना सहज हो जाता है मानों जन्मो-जन्मों से इसी पथ के राही हों. तब जीवन एक खेल लगता है.

Monday, September 10, 2012

मन हो जैसे खुला गगन



मन की कामनाओं की पूर्ति के लिए हम परिस्थितियों के गुलाम बन जाते हैं, सब कुछ होते हुए भी अभाव का अनुभव करते हैं, किसी के पास भोजन हो, वस्त्र हों, और घर हो फिर उसे क्या चाहिए, लेकिन मन इच्छाएं खड़ी किये जाता है और उसमें जो बाधा डालता है उस पर क्रोध जगाता है, सूक्ष्म अहंकार भी उसमें सम्मिलित होता है. हमें खुद पर इतना तो वश होना ही चाहिए कि वस्तुओं को उसके सही उपयोग की दृष्टि से ही आंकें. जिसका मन कभी खाली होता ही नहीं तो तन रूपी घर में रहने वाली आत्मा को कहाँ स्थान मिलेगा, वह सिकुड़ कर रहने के लिए विवश हो जाती है. जैसे ही हम अपनी सूक्ष्मतम भावनाओं के प्रति सजग हो जाते हैं, अनावश्यक अपने आप झर जाता है. मन खाली होने लगता है. तब हम ईश्वर की उपस्थिति को महसूस करने लगते हैं.उसकी याद ही मन को व्यर्थ की कामना में उलझने से बचाती है. ज्ञान भी तभी भीतर टिकता है. अखंड शांति का भाव जगता है.